जंगल में झोंपड़ी
ये सारी दुनिया मरासिम(संबन्धों)पर टिकी हुई है, अदावत से ले कर मोहब्बत तक।
बस यही मरासिम हमारी ज़िंदगी का सबसे स्याह/सफेद पन्ना बन जाते हैं।
लगाव,भावनाएँ रिश्ते ये सब वो चीजें हैं जो इंसान के दायरे तय करती हैं,इन चीजें का पक्ष अगर स्याह हो तो इंसान ताउम्र अपने जेहन से ही लड़ता रहेगा,अपनी प्रतिभा और व्यक्तित्व को बिना मौका मिले ही खत्म कर लेगा
लेकिन अगर यही पक्ष उजला हो तो इंसान असीमित क्षमताओं का प्रदर्शन करता है
बस यहीं से हम लोगों में कुंठा का जन्म होता है और ये कुंठा हमारे व्यक्तित्व से ले कर मानसिकता तक में झलकने लगती है
और फिर एक स्तर पर पहुंचने के बाद लगने लगता है कि इस सारी दुनिया से कहीं दूर चले जाएं
लेकिन ये संभव नहीं है,क्योंकि इंसानी फितरत में सब से ज्यादा वजन रिश्तों का होता है,जिनकी वजह से हम बहुत कुछ सह जाते हैं,बहुत कुछ झेल जाते हैं
यकीन मानिये जिस इंसान के साथ कोई रिश्ता जुड़ा हुआ नहीं हो वो इंसान दुनिया के सबसे संतुष्ट इंसानों में हो सकता है(लेकिन ये संभव ही नहीं है,क्योंकि पैदा होते ही हमारे रिश्ते बन जाते हैं)
कभी मन करता है किसी जंगल में निकल जाएं,वहां झोंपड़ी बनाएं,आराम से रहें।दुनिया की अदावतों-मोहब्बतों से दूर,सिर्फ सुकून हो,लेकिन जो हम हम जी चुके हैं क्या उसके बाद ये संभव है?
जंगल में झोंपड़ी के बहुत से फायदे हैं,लेकिन जो कुछ हमने "शहर" में किया-भोगा है क्या वो हमें किसी को वहां जाने देगा?
काश जंगलों की भी सभ्यता होती,और हम वहां जाते ही उनकी सभ्यता में रम जाते।
लेकिन जंगलों की सभ्यता नहीं होती, वो सिर्फ सभ्यता अपनाते हैं, बनाते नहीं।
इंसान बहुत सारा वजन ले कर चल रहा होता है,वो वजन सिर्फ रिश्तों का होता है,इसके अलावा इंसानी फ़ितरत में कोई भी वजन होता ही नहीं है।
यही वजन हमे जंगल की तरफ जाने नहीं देता, उधर जाएंगे तो रास्ते में थक जाएंगे,थोड़ा आगे जाएंगे तो ये वजन सहन ही नहीं होगा,फिर वापस लौट कर आना ही पड़ेगा।
वैसे जंगल बहुत हसीन है,वहां झोंपड़ी उसमें चार चांद लगा देगी।लेकिन हम अभी इतने "परिपक्व" नहीं हुए कि, उस जंगल की चादर को ओढ़ सकें,उस जंगल की झोंपड़ी में आशियाना बना सकें,उस जंगल की झोंपड़ी को अपने दर्द बयां कर सकें,उस जंगल की झोंपड़ी को रो कर बता दें कि "शहरी" दुनिया कैसी है।
उस जंगल की झोंपडी को बता दें कि कोई मुसाफिर यहाँ से गुज़रे तो बता देना कि-आगे की दुनिया तुम्हें सिर्फ फरेब और मक्कारी देगी,तुम टूटोगे तो वो तोड़ेगी,तुम बिखरोगे तो वो बिखेरेगी।उस मुसाफिर से कहना यहीं रुक जाओ,बस ज़िन्दगी यहीं है,आगे गए तो लौट कर नहीं आ पाओगे।
काश ये हो सकता
आखिर में
कुछ दोस्तों से वैसे मरासिम नहीं रहे
कुछ दुश्मनों से वैसी अदातवत नहीं रही
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